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⁣श्रीमद्भगवद्गीता का पहला श्लोक केवल एक संवाद नहीं,
जीवन के सबसे गहरे प्रश्न की शुरुआत है।

धृतराष्ट्र का प्रश्न —
“धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे…”
यह प्रश्न आज भी हर मनुष्य के भीतर गूंजता है।
जब जीवन धर्म और अधर्म के बीच खड़ा होता है,
तब मन पूछता है — अब क्या होगा?

गीता का पहला श्लोक हमें सिखाता है कि
जहाँ धर्म होता है,
वहाँ प्रश्न होते हैं,
संघर्ष होता है,
और वहीं से ज्ञान का जन्म होता है।

यह चैनल गीता को केवल श्लोक के रूप में नहीं,
बल्कि जीवन के मार्गदर्शन के रूप में प्रस्तुत करता है।

अगर आप शांति, समझ और आत्मबोध की तलाश में हैं,
तो यह यात्रा आपके लिए है। 🌸

🙏 सुनने के लिए नहीं,
जीने के लिए।

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⁣गीता का तीसरा श्लोक
हमें यह सिखाता है कि
जहाँ अहंकार होता है, वहाँ भीतर कहीं न कहीं भय छिपा होता है।

दुर्योधन अपनी सेना की विशालता देखकर भी
निश्चिंत नहीं है।
वह गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर
सेना की गिनती करवाता है।

यह श्लोक बताता है कि
जो व्यक्ति स्वयं धर्म पर नहीं खड़ा होता,
वह शक्ति के होते हुए भी
अस्थिर रहता है।

जीवन में भी जब हम
केवल संख्या, पद और बल पर भरोसा करते हैं,
तो भीतर का भय समाप्त नहीं होता।

गीता हमें सिखाती है —
सच्ची शक्ति धर्म से आती है,
और धर्म आत्मविश्वास देता है।

यह श्लोक
अहंकार और असुरक्षा के
सूक्ष्म अंतर को उजागर करता है।

अगर आप जीवन में
डर के कारणों को समझना चाहती हैं,
तो यह श्लोक आपके लिए है। 🌿

🙏 धन्यवाद —
गीता को पढ़ने के लिए नहीं,
स्वयं को पढ़ने के लिए।

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