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गाँव के बाहर एक पुराना पीपल था। लोग कहते थे, “सूरज ढलते ही उधर मत जाना।”
एक रात रामू ने हिम्मत की। जैसे ही वह पेड़ के पास पहुँचा, हवा रुक गई। अचानक पीछे से किसी ने फुसफुसाया—
“रामू…”
वह पलटा—कोई नहीं।
तभी ज़मीन पर उसकी ही परछाईं दिखी… जो हिल नहीं रही थी।
डर के मारे वह भागा। सुबह गाँव वालों ने पीपल के नीचे रामू की चप्पलें पाईं।
और तब से, हर रात कोई उसी आवाज़ में पुकारता है—
“रामू…”
“धर्म सिर्फ एक है – सनातन; हम हिन्द के वासी हैं, किसी ‘इज़्म’ नहीं, बस सनातनी हैं।”
“ना मैं किसी मज़हब से डरता, ना किसी लेबल से बंधा हूँ; मैं हिन्द की धरती का सनातनी हूँ, बस धर्म मेरा सनातन है, बाकी सब पंथ हैं।”
“पहचान ‘हिन्दू धर्म’ नहीं, मूल मेरा सनातन है; ज़मीन मेरी हिन्द की, और सांसों में जय श्री राम है
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