Seneste videoer

⁣बलराम और भगवान कृष्ण का परमधाम-गमन |Mahabharat-6 MausalParva Ch:3 Bhag-4
मित्रो!
“यदुवंश का विनाश – मौसलपर्व (भाग 4)” की कथा में आपका हार्दिक स्वागत है।

मित्रो,
पिछले भाग में आपने देखा… भगवान श्रीकृष्ण ने अपने ही हाथों से यदुवंशियों का संहार कर दिया। यह वही यदुवंश था जिस पर कभी सभी को गर्व था, जो अपनी वीरता और सामर्थ्य के लिए प्रसिद्ध था। परंतु नियति के खेल को कौन रोक पाया है?

गांधारी के शाप को भगवान ने सत्य कर दिखाया। ऋषियों के शाप से उत्पन्न मूसल ने यदुवंश का नाश किया—वह भी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के ही हाथों से। सोचिए, उग्रसेन ने मौसल को चूर्ण कर समुद्र में फेंक दिया और समझ लिया कि अब संकट टल गया। लेकिन भगवान की अद्भुत रचना देखिए—वही चूर्ण रेत में मिलकर एरका नामक घास बन गया, और जब वह घास श्रीकृष्ण के हाथों में आई तो वही भयंकर मौसल का रूप धारण कर बैठी। उसी मौसल ने पूरे यदुवंश का सर्वनाश कर डाला।

अब आप सोचिए, यह सब क्यों हुआ?
मित्रो, भगवान की लीला कौन जान पाया है? पर एक बात तो निश्चित है—जो भगवान के भक्त का अपमान करता है, उसका अंत निश्चित है। गांधारी के शाप का कारण भी यही था—और भगवान ने उसे अक्षरशः सत्य किया।

अगर ध्यान से देखा जाए तो पूरा यदुवंश—सात्यकि और भगवान श्रीकृष्ण को छोड़कर—महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर खड़ा था। एक प्रकार से वे पांडवों के अपराधी बने। और भगवान को चाहिए भी तो बस एक बहाना। अतः उन्होंने उसी दोष का आधार बनाकर अपने ही हाथों से पूरे यदुवंश का विनाश कर डाला।

परंतु भक्तों पर भगवान की कृपा देखिए—भक्त उद्धव को पहले ही वहां से हटा दिया गया। शेष में भगवान श्रीकृष्ण, बलरामजी, दारुक और बभरू जीवित रहे। इसके अतिरिक्त माता-पिता, कुल की स्त्रियाँ और बालक भी बचे।

तो मित्रो, भगवान की लीला अपार है। हम आप तो बस अनुमान भर लगा सकते हैं, पर उनकी माया के रहस्य को जानना असंभव है।

चलिए, अब आरंभ करते हैं आज की कथा—
“यदुवंश का विनाश – मौसलपर्व (भाग 4)”
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्तर दारुक, बभ्रु और भगवान् श्रीकृष्ण तीनों ही बलरामजीके चरणचिह्न देखते हुए वहाँसे चल दिये। थोड़ी ही देर बाद उन्होंने अनन्त पराक्रमी बलरामजीको एक वृक्षके नीचे विराजमान देखा, जो एकान्तमें बैठकर ध्यान कर रहे थे। मित्रो,
बलरामजी का चरित्र बड़ा ही अद्भुत और अलग था।
सोचिए ज़रा… जब महाभारत का महायुद्ध शुरू होने वाला था, तब कौरव और पांडव—दोनों ही बलरामजी के पास पहुँचे। दोनों को विश्वास था कि वे उनकी ओर से युद्ध में खड़े होंगे।

लेकिन बलरामजी ने क्या कहा?
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया—"मैं किसी की सहायता नहीं करूँगा।"
और उसी क्षण वे युद्धभूमि छोड़कर तीर्थयात्रा पर निकल पड़े।

अब आप ही बताइए मित्रो—क्या यह निर्णय उचित नहीं था?
क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण पहले ही कह चुके थे कि वे शस्त्र नहीं उठाएँगे।
अगर बलरामजी युद्ध में होते… तो क्या वे अपना हल नीचे रख पाते?
शायद नहीं! और अगर उन्होंने हल उठा लिया होता, तो युद्ध का संतुलन ही बिगड़ जाता।

बलरामजी बड़े भाई थे… सम्मानित थे… लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि यदुवंशी वही मानते थे, जो भगवान श्रीकृष्ण कहते थे।
अब आप सोचिए—बड़े भाई होकर भी उनकी नहीं, बल्कि छोटे भाई कृष्ण की ही क्यों चलती थी?

यही तो भगवान की महिमा है मित्रो।
रामावतार में वे बड़े भाई बने—तो हुआ वही, जो भगवान ने चाहा।
कृष्णावतार में वे छोटे भाई बने—फिर भी अंततः वही हुआ, जो भगवान ने ठाना।

तो निष्कर्ष क्या निकला?
भगवान बड़े हों या छोटे—जग में चलता वही है जो भगवान चाहते हैं। कथा में वापस आते है......
उन महानुभावके पास पहुँचकर श्रीकृष्णने तत्काल दारुकको आज्ञा दी कि तुम शीघ्र ही कुरुदेशकी राजधानी हस्तिनापुरमें जाकर अर्जुनको यादवोंके इस महासंहारका सारा समाचार कह सुनाओ।

‘ब्राह्मणोंके शापसे यदुवंशियोंकी मृत्युका समाचार पाकर अर्जुन शीघ्र ही द्वारका चले आवें।’ श्रीकृष्णके इस प्रकार आज्ञा देनेपर दारुक रथपर सवार हो तत्काल कुरुदेशको चला गया। वह भी इस महान् शोकसे अचेत-सा हो रहा था। मित्रो, यदुवंश का संहार हो चुका था। द्वारका में चारों ओर शोक का वातावरण छा गया था। ऐसे समय भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम विश्वस्त सारथी दारुक को बुलाया और आदेश दिया कि वह तुरंत हस्तिनापुर जाकर अर्जुन को इस विनाश का समाचार दे। श्रीकृष्ण ने कहा—“ब्राह्मणों के शाप से यादवों का नाश हो चुका है, यह बात अर्जुन को बताना और उनसे कहना कि वे शीघ्र ही द्वारका आएं।” यह आदेश इसलिए दिया गया क्योंकि अब स्त्रियों और बच्चों की रक्षा के लिए अर्जुन का आना अत्यंत आवश्यक था।

दारुक भगवान का प्रिय सेवक था, परंतु वह भी इस महान विपत्ति से व्याकुल और शोकाकुल हो गया। रथ पर सवार होकर जब वह कुरु-देश की ओर बढ़ा, तो उसका हृदय भारी था, मानो चेतना ही खो बैठा हो। इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि भगवान हमेशा संकट की घड़ी में अपने सच्चे और विश्वस्त भक्त को ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपते हैं। साथ ही यह भी कि श्रीकृष्ण स्वयं अब पृथ्वी-लीला समाप्त करने वाले थे, इसलिए अंतिम समय में उन्होंने अपने प्रिय सखा अर्जुन को ही यह उत्तरदायित्व सौंपा। कथा में वापस आते है........

#mahabharat

⁣यदुवंश का विनाश आरंभ |Mahabharat-6 MausalParva Ch:3 Bhag-3
मित्रो!
#mahabharat
“यदुवंश का विनाश – मौसलपर्व (भाग 3)” की कथा में आपका हार्दिक स्वागत है।


पिछले भाग में आपने देखा…

भगवान श्रीकृष्ण ने जब प्रकृति के अनिष्ट संकेत देखे, तो यदुवंशियों से कहा –

“वीरों! आप सब प्रभास-तीर्थ की यात्रा की तैयारी करो। शायद पुण्य के प्रभाव से ऋषियों के शाप का निवारण हो सके।”


परंतु मित्रो, यहाँ प्रश्न यह है – क्या शाप को टाला जा सकता है?

क्या भाग्य की रेखा मिटाई जा सकती है?


इस रहस्य को समझने के लिए, मैं आपको महाभारत के युद्ध-काल में थोड़ा पीछे ले चलता हूँ।

युद्ध समाप्त हो चुका था… दुर्योधन मारा जा चुका था… और पाण्डव विजयश्री से विभूषित थे।


किन्तु… महाराज युधिष्ठिर के मन में गहरी चिंता थी।

वे सोच रहे थे –

“जब माता गांधारी को अपने सौ पुत्रों के वध का समाचार मिलेगा… तो वे कैसी प्रतिक्रिया देंगी? कहीं उनका शाप समस्त पाण्डवों पर न टूट पड़े।”


फिर, भगवान कृष्ण के साथ पाण्डव गांधारी के सम्मुख पहुँचे।

गांधारी ने युधिष्ठिर को खोजा और पूछा –

“कहाँ है वह… जिसने मेरे पुत्रों का वध किया?”


युधिष्ठिर ने विनम्र भाव से स्वीकार किया –

“माता, यह सब मेरे ही हाथों हुआ है। यदि आप चाहें तो मुझे शाप दे दीजिए।”


गांधारी मौन रहीं…

परन्तु उनके हृदय का क्रोध शांत नहीं हुआ।

उन्होंने अपनी आँखों की पट्टी के भीतर से ही युधिष्ठिर के चरणों पर दृष्टि डाल दी।

मित्रो, तभी से युधिष्ठिर के नख सदा के लिए श्यामवर्ण हो गए।


लेकिन गांधारी का रोष अभी शेष था।

उन्होंने भगवान कृष्ण की ओर देखा और कहा –

“कृष्ण! तुम्हारे पास सामर्थ्य था, किंतु तुमने मौन रहकर मेरे वंश का विनाश होने दिया।

इसलिए सुनो… मैं तुम्हें और तुम्हारे यदुवंश को शाप देती हूँ – छत्तीसवें वर्ष में, यदुवंशी आपस में ही लड़कर नष्ट हो जाएंगे… और तुम्हारा वध एक बहेलिये के हाथों होगा।”


मित्रो, यह सुनकर भी श्रीकृष्ण शांत रहे।

उन्होंने केवल इतना कहा –

“माता, आपने जो कहा वह पहले से ही निश्चित है। यदुवंशियों का संहार कोई देवता भी नहीं कर सकता। उनका अंत केवल मेरे ही हाथों होना लिखा है। वे आपस में लड़कर ही नष्ट होंगे।”


तो देखिए मित्रो…

गांधारी का यही शाप यदुवंश के विनाश का मूल कारण बना।

ऋषियों का शाप तो केवल उस परिणाम को घटित करने का साधन था।


याद रखिए –

भगवान सर्वशक्तिमान हैं, लेकिन वे मनुष्यों के कर्म में हस्तक्षेप नहीं करते।

यदि वे चाहते तो महाभारत का युद्ध कभी होता ही नहीं…

किन्तु तब कर्म का विधान ही समाप्त हो जाता।

⁣भगवान राम विभीषण संवाद | सुंदर कांड रामचरितमानस -1

Rashtravaadi SanatanBharat में आपका स्वागत है !
#ramacharitamanas #ramcharitmanas
हम सनातनी ऋषियों की संतान है। नारायण के आत्मज ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र मरीचि हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप हुए जिन्होंने प्रजापति के १२ कन्याओं से विवाह कर अनेक तेजश्वी पुत्र उत्पन्न किए। उन १२ कन्याओं में मुख्य अदिति ने विवस्वान (सूर्य) को जन्म दिया। सूर्य के पुत्र मनु हुए जिनकी कन्या इला ने बुध से विवाह किया और पुरुरवा को जन्म दिया। बुध के पिता बृहस्पति हुए, जो अंगिरा के पुत्र हुए और अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र हुए। इस तरह से हम ययाति के पुत्र यदु (यदु वंश), पुरु (कुरुवश), तुवर्सु (यवन) , द्रुहु (भोजवंशी) , अणु (मलेच्छ) यही सारी मानवता के जनक हुए। सम्पूर्ण संसार सनातन से ही उत्पन्न हुआ है और मुझे गर्व है हम ऋषियों की संतान है। सनातन ही जगत का आधार है।
मेरे चैनल Rashtravaadi Sanatanbharat को subscribe, लाइक forward कीजिए । धन्यवाद ! मै राष्ट्रवादी सनातनी भारतीय हूँ।

⁣प्रभासक्षेत्र का प्रलय और श्रीकृष्ण की अंतिम लीला |Mahabharat-6 MausalParva Ch:2 Bhag-2
"मित्रो! #mahabharat
“यदुवंश का विनाश – मौसलपर्व (भाग 2)” की कथा में आपका हार्दिक स्वागत है।

पिछले भाग में आपने देखा… भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने ऋषियों के साथ मज़ाक किया। उस मज़ाक के कारण उसे और पूरे यदुवंश को भयानक शाप मिला। ऋषियों ने कहा—यादवों का विनाश एक मौसल, एक लोहे के मुसल से ही होगा।

महाराज उग्रसेन ने तत्काल उस मुसल को चूर्ण बनवाया और समुद्र में फिंकवा दिया। लेकिन… क्या सचमुच इससे यदुवंश का विनाश टल सकेगा? क्या शाप को रोका जा सकता है? यह तो कथा जैसे आगे बढ़ेगी तब ही इसका पता चलेगा



भगवान की लीला कितनी गहरी है, इसे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी नहीं समझ पाते। भविष्य में जो लिखा है, वही घटित होता है। विधि का विधान कोई नहीं टाल सकता।

भगवान कर्म का विधान बनाते हैं, लेकिन स्वयं कभी किसी के कर्म में बाधा नहीं डालते। न ही किसी को जबरन रोकते है ।
जैसे—महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र और दुर्योधन को शान्ति का संदेश दिया था। परन्तु… क्या उन्होंने उसे माना? नहीं! और भगवान ने उन्हें मानने के लिए बाध्य भी नहीं किया।

सत्य यही है—कर्म करने में मनुष्य स्वतंत्र है… लेकिन फल भोगने में नहीं। उसका न्याय केवल भगवान करते हैं।

मेरे पूज्य गुरु श्री रामसुखदासजी कहा करते थे—“ज्ञानी पुरुष आपको समाधान बता देंगे, पर उसे मानने के लिए कभी विवश नहीं करेंगे।”
यही नियम भगवान पर भी लागू होता है।

तो साधकों! यह समझ लीजिए—वह कर्म कीजिए जिससे जीवन सुखी हो, और भगवान की कृपा सहज ही मिल जाए।

अब देखिए… आगे इस कथा में क्या घटता है।
क्या यदुवंश का विनाश सचमुच निश्चित है?
या फिर कोई उपाय शेष है?

✨ यही सब हम जानेंगे इस दूसरे भाग में… वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन् ! इस प्रकार वृष्णि और अन्धकवंश के लोग अपने ऊपर आनेवाले संकट का निवारण करने के लिये भाँति-भाँति के प्रयत्न कर रहे थे और उधर काल प्रतिदिन सबके घरों में चक्कर लगाया करता था।

उसका स्वरूप विकराल और वेश विकट था। उसके शरीर का रंग काला और पीला था। वह मुँड़ मुड़ाये हुए पुरुष के रूप में वृष्णिवंशियों के घरों में प्रवेश करके सबको देखता और कभी-कभी अदृश्य हो जाता था।

उसे देखने पर बड़े-बड़े धनुर्धर वीर उसके ऊपर लाखों बाणों का प्रहार करते थे; परंतु सम्पूर्ण भूतों का विनाश करनेवाले उस काल को वे वेध नहीं पाते थे। मित्रो, काल का आना और उसका अजेय रूप इस बात का संकेत है कि वृष्णि और अंधकवंश का विनाश निश्चित था। चाहे वे कितने ही प्रयास कर लें, समय और नियति के आगे कोई टिक नहीं सकता। यह घटना हमें सिखाती है कि मनुष्य अपनी सामर्थ्य और शौर्य पर कितना भी गर्व करे, पर अंततः सबको काल के सामने नतमस्तक होना पड़ता है। काल को एक मुँड़ मुड़ाये हुए पुरुष के रूप में दिखाया गया है। इससे यह संदेश मिलता है कि काल न तो किसी का सखा है, न शत्रु—वह विरक्त साधु की तरह सबको समान दृष्टि से देखता है।

उसका काला और पीला रंग जीवन के दो पहलुओं को प्रकट करता है—काला मृत्यु और विनाश का प्रतीक है, तो पीला रोग, क्षय और क्षीणता का। अर्थात् काल केवल युद्ध में नहीं मारता, बल्कि रोग, क्षय और समय की गति से भी मनुष्य का अंत करता है।

वीर योद्धाओं का उस पर लाखों बाण चलाना और असफल होना यह दर्शाता है कि चाहे शौर्य कितना भी हो, पर समय और मृत्यु को जीत पाना असंभव है।

मित्रो, इस प्रकार, काल का यह मानवीकरण महाभारत के दर्शन को उजागर करता है—संसार का सबसे बड़ा विजेता भी काल से पराजित होता है। मित्रो, मनुष्य आज भी अपने घरों में तरह-तरह के उपाय करता है—धन, वैभव, सुरक्षा, विज्ञान और चिकित्सा के सहारे संकटों से बचना चाहता है। लेकिन जैसे यदुवंशी वीर अपने बाणों से काल को नहीं रोक सके, वैसे ही हम भी समय और मृत्यु को नहीं रोक सकते।

काला और पीला रंग आज की भाषा में बीमारी, दुर्घटना, वृद्धावस्था और अनिश्चित परिस्थितियों का प्रतीक है। कितनी भी तरक्की हो जाए, कोई तकनीक या सामर्थ्य काल को परास्त नहीं कर सकती।

इसलिए महाभारत का यह संदेश हर युग में प्रासंगिक है—
मनुष्य को अपने अहंकार, शक्ति और साधनों पर नहीं, बल्कि धर्म, सत्कर्म और ईश्वर-शरण पर भरोसा करना चाहिए।
क्योंकि काल का प्रहार अटल है, लेकिन जो धर्म में स्थित होता है, उसके लिए काल का आगमन भी भय का कारण नहीं बनता, बल्कि मोक्ष का द्वार खोल देता है। चलिए कथा में वापस आते है, वैशम्पायन जी कहते है....

अब प्रतिदिन अनेक बार भयंकर आँधी उठने लगी, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी। उससे वृष्णियों और अन्धकों के विनाश की सूचना मिल रही थी।

चूहे इतने बढ़ गये थे कि वे सड़कों पर छाये रहते थे। मिट्टी के बरतनों में छेद कर देते थे तथा रात में सोये हुए मनुष्यों के केश और नख कुतरकर खा जाया करते थे।

वृष्णिवंशियों के घरों में मैनाएँ दिन-रात चें-चें किया करती थीं। उनकी आवाज कभी एक क्षण के लिये भी बंद नहीं होती थी।

सारस उल्लुओं की और बकरे गीदड़ों की बोली की नकल करने लगे।

काल की प्रेरणा से वृष्णियों और अन्धकों के घरों में सफेद पंख और लाल पैरोंवाले कबूतर घूमने लगे।

गायों के पेट से गदहे, खच्चरियों से हाथी, कुतियों से बिलाव और नेवलियों के गर्भ से चूहे पैदा होने लगे। मित्रो, इन भयंकर अपशकुनों ने स्पष्ट कर दिया था कि वृष्णियों और अंधकों का विनाश अवश्यंभावी है। प्रतिदिन उठने वाली भयानक आँधियाँ आने वाले तूफ़ान का संकेत दे रही थीं। चूहों का सड़कों पर छा जाना और मनुष्यों तक को कुतरना इस बात का द्योतक था कि समाज की नींव भीतर से गल चुकी है। मैनाओं का निरंतर शोर, सारसों का उल्लू और गीदड़ जैसी बोली बोलना, यह सब प्रकृति का अस्वाभाविक और विचित्र रूप था। यहाँ तक कि कबूतर भी लाल पैरों और सफेद पंखों के साथ घर-घर घूमते, मानो काल स्वयं दूत बनकर उपस्थित हो गया हो। सबसे विचित्र तो

⁣Rashtravaadi SanatanBharat में आपका स्वागत है !

हम सनातनी ऋषियों की संतान है। नारायण के आत्मज ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र मरीचि हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप हुए जिन्होंने प्रजापति के १२ कन्याओं से विवाह कर अनेक तेजश्वी पुत्र उत्पन्न किए। उन १२ कन्याओं में मुख्य अदिति ने विवस्वान (सूर्य) को जन्म दिया। सूर्य के पुत्र मनु हुए जिनकी कन्या इला ने बुध से विवाह किया और पुरुरवा को जन्म दिया। बुध के पिता बृहस्पति हुए, जो अंगिरा के पुत्र हुए और अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र हुए। इस तरह से हम ययाति के पुत्र यदु (यदु वंश), पुरु (कुरुवश), तुवर्सु (यवन) , द्रुहु (भोजवंशी) , अणु (मलेच्छ) यही सारी मानवता के जनक हुए। सम्पूर्ण संसार सनातन से ही उत्पन्न हुआ है और मुझे गर्व है हम ऋषियों की संतान है। सनातन ही जगत का आधार है।
मेरे चैनल Rashtravaadi Sanatanbharat को subscribe, लाइक forward कीजिए । धन्यवाद ! मै राष्ट्रवादी सनातनी भारतीय हूँ।

⁣Rashtravaadi SanatanBharat में आपका स्वागत है !

हम सनातनी ऋषियों की संतान है। नारायण के आत्मज ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र मरीचि हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप हुए जिन्होंने प्रजापति के १२ कन्याओं से विवाह कर अनेक तेजश्वी पुत्र उत्पन्न किए। उन १२ कन्याओं में मुख्य अदिति ने विवस्वान (सूर्य) को जन्म दिया। सूर्य के पुत्र मनु हुए जिनकी कन्या इला ने बुध से विवाह किया और पुरुरवा को जन्म दिया। बुध के पिता बृहस्पति हुए, जो अंगिरा के पुत्र हुए और अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र हुए। इस तरह से हम ययाति के पुत्र यदु (यदु वंश), पुरु (कुरुवश), तुवर्सु (यवन) , द्रुहु (भोजवंशी) , अणु (मलेच्छ) यही सारी मानवता के जनक हुए। सम्पूर्ण संसार सनातन से ही उत्पन्न हुआ है और मुझे गर्व है हम ऋषियों की संतान है। सनातन ही जगत का आधार है।
मेरे चैनल Rashtravaadi Sanatanbharat को subscribe, लाइक forward कीजिए । धन्यवाद ! मै राष्ट्रवादी सनातनी भारतीय हूँ।

⁣Rashtravaadi SanatanBharat में आपका स्वागत है !

हम सनातनी ऋषियों की संतान है। नारायण के आत्मज ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र मरीचि हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप हुए जिन्होंने प्रजापति के १२ कन्याओं से विवाह कर अनेक तेजश्वी पुत्र उत्पन्न किए। उन १२ कन्याओं में मुख्य अदिति ने विवस्वान (सूर्य) को जन्म दिया। सूर्य के पुत्र मनु हुए जिनकी कन्या इला ने बुध से विवाह किया और पुरुरवा को जन्म दिया। बुध के पिता बृहस्पति हुए, जो अंगिरा के पुत्र हुए और अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र हुए। इस तरह से हम ययाति के पुत्र यदु (यदु वंश), पुरु (कुरुवश), तुवर्सु (यवन) , द्रुहु (भोजवंशी) , अणु (मलेच्छ) यही सारी मानवता के जनक हुए। सम्पूर्ण संसार सनातन से ही उत्पन्न हुआ है और मुझे गर्व है हम ऋषियों की संतान है। सनातन ही जगत का आधार है।
मेरे चैनल Rashtravaadi Sanatanbharat को subscribe, लाइक forward कीजिए । धन्यवाद ! मै राष्ट्रवादी सनातनी भारतीय हूँ।

⁣जब स्वयं श्रीकृष्ण बने अपने ही वंश के विनाश के कारण |Mahabharat-6 MausalParva Ch:1 Bhag-1#mahabharat
"मित्रो!
आज मैं आपके लिए महाभारत का वह अनछुआ अंश लेकर आया हूँ, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था।
भगवान श्रीकृष्ण ने कौरवों और असंख्य दुष्टों का अंत कर धर्म की स्थापना कर दी थी।
युधिष्ठिर महाराज ने अश्वमेध यज्ञ किया, जो राज्य अब तक अजेय थे, वे भी पराजित हो गए।
भारतवर्ष चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर के शासन में आ चुका था।

भगवान कृष्ण ने पृथ्वी का भार उतारने के लिए अवतार लिया था—और युद्ध के बाद यह कार्य पूरा भी हो गया।
लेकिन… क्या आप जानते हैं कि महाभारत का अन्त युद्धभूमि पर नहीं हुआ?

जब धर्म की स्थापना हो चुकी थी, पृथ्वी का भार उतर चुका था, युधिष्ठिर चक्रवर्ती बन चुके थे…
तब श्रीकृष्ण ने देखा—एक बहुत बड़ा बोझ अब भी शेष है।
यह बोझ था यदुवंश।

द्वापर का युग समाप्ति की ओर बढ़ रहा था और कलियुग का प्रवेश होने वाला था।
भगवान कृष्ण ने सोचा—
सात्यकि, कृतवर्मा, अनिरुद्ध, सांब जैसे पराक्रमी वीर यदि जीवित रह गए…
तो आने वाले कलियुग के लिए यह मानवता पर भारी पड़ सकता है।

क्योंकि कलियुग में मनुष्य की बुद्धि भ्रष्ट होगी, धर्म का लोप होगा…
और यदि अपार शक्ति समय के साथ क्षीण न हुई, तो यह सम्पूर्ण जगत के लिए विनाशकारी होगा।

यही सोचकर भगवान कृष्ण ने निश्चय किया कि—
पृथ्वी त्यागने से पहले वे यदुवंश का नाश अवश्य करेंगे।

लेकिन… प्रश्न यह है कि कैसे?
क्या उपाय किया भगवान ने?
यह अभी मैं आपको नहीं बताऊँगा…
जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ेगी, आप स्वयं जान पाएँगे।

मित्रो! यह कथा है यदुवंश के विनाश की —
महाभारत के मौसलपर्व से लिया गया प्रसंग।
यह कथा आठ अध्यायों में विस्तृत है, इसलिए मैं इसे आपके सामने आठ भागों में प्रस्तुत करूँगा।

उम्मीद है कि यह रहस्यमयी कथा आपको पसंद आएगी और आपको बहुत कुछ सिखाएगी भी।
तो चलिए, आरम्भ करते हैं पहला भाग—
यदुवंश का विनाश | मौसलपर्व – भाग 1।"

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! महाभारत युद्धके पश्चात् जब छत्तीसवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ तब कौरवनन्दन राजा युधिष्ठिरको कई तरहके अपशकुन दिखायी देने लगे। "मित्रो! आपको यह बताते चलूँ कि भगवान श्रीकृष्ण ने लगभग 125 वर्ष तक इस धराधाम पर रहकर ब्रह्माजी की इच्छा पूरी की—
यानी दुष्टों का संहार और धर्म की स्थापना।

इसका अर्थ यह हुआ कि जब पाण्डव द्यूत-सभा में पराजित हुए थे, उस समय उनकी आयु लगभग 76 वर्ष के आसपास रही होगी।
अब यदि इसमें 13 वर्ष का वनवास जोड़ दें तो संख्या पहुँचती है 89 पर।
यानी महाभारत युद्ध के समय अर्जुन की आयु लगभग 90 वर्ष रही होगी।

अब आप सोच रहे होंगे—
कलियुग में तो 60 वर्ष की आयु में ही लोग वृद्ध हो जाते हैं,
फिर 90 वर्ष का योद्धा युद्धभूमि में कैसे उतरा होगा?

मित्रो, इसका रहस्य युगधर्म में छिपा है।
हर युग का अपना धर्म, अपनी व्यवस्था और अपनी आयु सीमा होती है।

यह अनुमान मैं आप पर छोड़ता हूँ।
आप ही सोचिए… कितने शताब्दियों के बराबर उनके जीवन का विस्तार रहा होगा।

चलिए मित्रो, अब कथा में वापस लौटते हैं…"



वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय!
बिजलीकी गड़गड़ाहटके साथ बालू और कंकड़ बरसानेवाली प्रचण्ड आँधी चलने लगी। पक्षी दाहिनी ओर मण्डल बनाकर उड़ते दिखायी देने लगे।

बड़ी-बड़ी नदियाँ बालूके भीतर छिपकर बहने लगीं। दिशाएँ कुहरेसे आच्छादित हो गयीं। आकाशसे पृथ्वीपर अंगार बरसानेवाली उल्काएँ गिरने लगीं।

सूर्यमण्डल धूलसे आच्छन्न हो गया था। उदयकालमें सूर्य तेजोहीन प्रतीत होते थे और उनका मण्डल प्रतिदिन अनेक बिना सिरके धड़ों से युक्त दिखायी देता था।

चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके चारों ओर भयानक घेरे दृष्टिगोचर होते थे। उन घेरोंमें तीन रंग प्रतीत होते थे। उनका किनारेका भाग काला एवं रूखा होता था। बीचमें भस्मके समान धूसर रंग दीखता था और भीतरी किनारेकी कान्ति अरुणवर्णकी दृष्टिगोचर होती थी।

राजन्! ये तथा और भी बहुत-से भयसूचक उत्पात दिखायी देने लगे, जो हृदयको उद्विग्न कर देनेवाले थे। मित्रो, इन भयंकर अपशकुनों से यह स्पष्ट हो गया कि प्रकृति स्वयं आने वाले अनर्थ की सूचना दे रही थी। आकाश, दिशाएँ, सूर्य-चन्द्रमा और नदियों तक का असामान्य व्यवहार यही संकेत करता था कि अब एक महान वंश का अंत निकट है और समय का चक्र अपना कठोर निर्णय सुनाने वाला है। कथा में वापस आते है



इसके थोड़े ही दिनों बाद कुरुराज युधिष्ठिरने यह समाचार सुना कि मूसलको निमित्त बनाकर आपसमें महान् युद्ध हुआ है; जिसमें समस्त वृष्णिवंशियोंका संहार हो गया। केवल भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी ही उस विनाशसे बचे हुए हैं। यह सब सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने समस्त भाइयोंको बुलाया और पूछा - 'अब हमें क्या करना चाहिये?'

ब्राह्मणोंके शापके बलसे विवश हो आपसमें लड़-भिड़कर सारे वृष्णिवंशी विनष्ट हो गये। यह बात सुनकर पाण्डवोंको बड़ी वेदना हुई।

इस मौसलकाण्डकी बातको लेकर सारे पाण्डव दुःख-शोकमें विषाद छा गया और वे हताश हो मन मारकर बैठ गये। मित्रो !
यदुवंश के नाश की यह घटना सुनकर युधिष्ठिर गहरे दुःख में डूब गए। मूसल के शाप ने अपना असर दिखाया और शक्तिशाली वृष्णि-वीर आपस में ही लड़कर नष्ट हो गए। सोचो, जो वीर कुरुक्षेत्र में अपराजित रहे, वही अपने ही भाई-बन्धुओं के हाथों समाप्त हो गए—यह नियति की विडम्बना थी।

युधिष्ठिर ने जब सुना कि कृष्ण और बलराम को छोड़कर समस्त यादव वंश नष्ट हो चुका है, तो पाण्डवों के हृदय पर भारी आघात पहुँचा। वे असहाय और विषाद से भरे हुए सोचने लगे कि अब आगे क्या करना चाहिए।

मित्र, यही तो इस कथा का गूढ़ संदेश है—जब समय का चक्र घूमता है तो सबसे शक्तिशाली कुल भी अपने ही कर्म और नियति के हाथों मिट जाते हैं।" कथा में वापस आते है



जनमेजयने पूछा— भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते वृष्णियोंसहित अन्धक तथा महारथी भोजवंशी क्षत्रिय कैसे नष्ट हो गये?

⁣राधा, सीता और पार्वती — तीनों की माताओं का गुप्त रहस्य | ShivMahapuran ParvatiKhand Ch:2 #shivaparvati #shiv #shiva #shivshankar मित्रो — आज मैं आपके लिए एक अद्भुत, रहस्यमय और अत्यंत दिव्य कथा लेकर आया हूँ, जो सीधे जुड़ी है भगवान शिव, भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण से।

अक्सर आपने सुना होगा — कुछ लोग कहते हैं कि राधारानी का वर्णन कहीं नहीं मिलता, यह केवल एक लोककथा या दंतकथा हैं। परन्तु, ऐसा बिल्कुल नहीं है!

राधाजी का उल्लेख, उनका स्वरूप, उनकी भक्ति और उनकी महिमा — स्वयं शिवमहापुराण में विस्तारपूर्वक वर्णित है।

तो आइए, श्रद्धा और प्रेम के साथ, इस अद्भुत कथा का आरंभ करते हैं… मित्रो,

यह है “मेना, धन्या और कलावती” तीन दिव्य कन्याओं की कथा — जो शिव पुराण (रुद्र संहिता – पार्वती खंड के दूसरे अध्याय ) में वर्णित है।


आज हम जानेंगे एक अत्यंत अद्भुत और दुर्लभ कथा — तीन दिव्य बहनों की कहानी, जिनका संबंध स्वयं देवी पार्वती, माता सीता और राधा रानी से जुड़ा हुआ है।
ये हैं — मेना, धन्या और कलावती।
आइए, शुरू करते हैं यह रहस्यमयी कथा, जो शिवपुराण में वर्णित है।

एक समय की बात है —
प्रजापति दक्ष की अनेक कन्याएँ थीं। उन्हीं में से एक कन्या थीं स्वधा, जिन्हें उनके पिता ने पितरों को दान में दे दिया था।
स्वधा बड़ी पतिव्रता और धर्मनिष्ठा थीं। पितरों की सेवा में सदैव लगी रहतीं।

उनकी भक्ति और तप से प्रसन्न होकर पितरों ने उन्हें आशीर्वाद दिया —
“हे स्वधा! तुम्हारे तप और सेवा से हम अत्यंत प्रसन्न हैं। तुम्हें तीन दिव्य पुत्रियाँ प्राप्त होंगी, जो देवियों के समान तेजस्विनी होंगी।”

और तभी स्वधा से तीन अद्भुत कन्याएँ उत्पन्न हुईं —
मेना, धन्या, और कलावती।

ये तीनों कन्याएँ किसी साधारण माता-पिता की संतान नहीं थीं — ये मनस-पुत्रियाँ थीं, अर्थात् योगबल और दिव्य संकल्प से उत्पन्न हुई थी ।
तीनों में अद्भुत सौंदर्य, तेज और आध्यात्मिक शक्ति थी।

समय बीता।
तीनों बहनों को एक दिन यह इच्छा हुई कि वे श्वेतद्वीप जाएँ — वह स्थान जहाँ भगवान विष्णु स्वयं अपने शुद्ध स्वरूप में निवास करते हैं।

वे वहाँ पहुँचीं और उन्होंने भगवान विष्णु को प्रणाम किया।
उसी समय वहाँ सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार जैसे ब्रह्मर्षि भी उपस्थित थे — जो सदैव ध्यानमग्न रहते हैं।

सभी देवता और दिव्य स्त्रियाँ उन मुनियों के सम्मान में खड़ी हो गईं,
किन्तु मेना, धन्या और कलावती — किसी अज्ञात कारण से — वहीं बैठी रहीं।

यह अ-सम्मान देखकर मुनियों के मुख पर कठोरता छा गई।

मुनियों ने कहा —
“तुम्हें अहंकार है अपने सौंदर्य और तेज का!
हे कन्याओ! तुम दिव्य लोक में रहकर भी मर्यादा भूल गईं।
अतः अब तुम्हें स्वर्गलोक से पतित होकर पृथ्वी पर मानव रूप में जन्म लेना होगा!”

तीनों बहनें भयभीत होकर मुनियों के चरणों में गिर पड़ीं —
“भगवन्! यदि हमसे कोई भूल हो गई है, तो क्षमा करें। हम तो अनजाने में यह अपराध कर बैठीं।”

तब उन सनकादि मुनियों का हृदय पिघल गया।
उन्होंने कहा —
“हे कन्याओ! यद्यपि हमारा वचन झूठा नहीं हो सकता,
पर हमारा श्राप ही तुम्हारे लिए वरदान बन जाएगा।”

उन्होंने तीनों को आशीर्वाद दिया —

मेना — “तुम पृथ्वी पर हिमवान पर्वतराज की पत्नी बनोगी।
तुम्हारे गर्भ से स्वयं देवी पार्वती का जन्म होगा,
जो शिवशक्ति स्वरूपा होंगी।”

धन्या — “तुम राजा जनक की पत्नी बनोगी,
और तुम्हारे गर्भ से सीता उत्पन्न होंगी — जो स्वयं लक्ष्मी का अवतार होंगी।”

कलावती — “तुम वृषभानु गोप की पत्नी बनोगी,
और तुम्हारी पुत्री होगी राधा रानी,
जो श्रीकृष्ण की हृदयस्वरूपा कहलाएगी।”
तो मित्रो यहाँ हमे राधाजी के माता कलावती का वर्णन मिलता है... आज के बाद यदि कोई राधाजी के बारे में संदेह व्यक्त करे तो शिव महापुराण को कोट कीजिएगा......आगे कथा में .....

समय आने पर तीनों बहनें मानव रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुईं —
मेना ने हिमालयराज हिमवान से विवाह किया और पार्वती की जननी बनीं।
धन्या ने राजा जनक से विवाह किया और सीता माता को जन्म दिया।
कलावती ने वृषभानु गोप से विवाह किया और राधा रानी की जननी बनीं।

इस प्रकार तीनों दिव्य बहनों ने तीनों युगों में तीन स्वरूपों में —
शक्ति, भक्ति और प्रेम के स्तंभों को स्थिर किया।

मित्रो,
यह कथा केवल तीन स्त्रियों की नहीं, बल्कि तीन आदर्शों की कथा है —

मेना – तप और शक्ति की प्रतीक।

धन्या – त्याग और मर्यादा की प्रतीक।

कलावती – प्रेम और माधुर्य की प्रतीक।

शिवपुराण हमें यह सिखाता है कि जब किसी का कर्म और हृदय पवित्र हो,
तो श्राप भी वरदान बन जाता है।
कथा का सार...

स्वधा से तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं — मेना, धन्या, कलावती।
मुनियों के श्राप से वे पृथ्वी पर जन्मीं।
मेना बनीं पार्वती की माता, धन्या बनीं सीता की माता, कलावती बनीं राधा की माता।
तीनों ने क्रमशः शक्ति, त्याग और प्रेम की परंपरा को पृथ्वी पर स्थिर किया।

मित्रो,
यह थी मेना, धन्या और कलावती की रहस्यमयी कथा —
जहाँ श्राप भी वरदान बन गया, और मातृत्व ने तीनों लोकों को दिव्यता से भर दिया।

यदि कथा ठीक लगे तो शेयर कीजिए.......

जय माँ पार्वती!
जय शिव शंकर!
🔱 हर हर महादेव!

⁣Story of Chinab River (Chandra Bhaga River) Indus Valley Civilization
Rashtravaadi SanatanBharat में आपका स्वागत है !
#indusriver #indusriversystem #indusvalleycivilization #chinaab
हम सनातनी ऋषियों की संतान है। नारायण के आत्मज ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र मरीचि हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप हुए जिन्होंने प्रजापति के १२ कन्याओं से विवाह कर अनेक तेजश्वी पुत्र उत्पन्न किए। उन १२ कन्याओं में मुख्य अदिति ने विवस्वान (सूर्य) को जन्म दिया। सूर्य के पुत्र मनु हुए जिनकी कन्या इला ने बुध से विवाह किया और पुरुरवा को जन्म दिया। बुध के पिता बृहस्पति हुए, जो अंगिरा के पुत्र हुए और अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र हुए। इस तरह से हम ययाति के पुत्र यदु (यदु वंश), पुरु (कुरुवश), तुवर्सु (यवन) , द्रुहु (भोजवंशी) , अणु (मलेच्छ) यही सारी मानवता के जनक हुए। सम्पूर्ण संसार सनातन से ही उत्पन्न हुआ है और मुझे गर्व है हम ऋषियों की संतान है। सनातन ही जगत का आधार है।
मेरे चैनल Rashtravaadi Sanatanbharat को subscribe, लाइक forward कीजिए । धन्यवाद ! मै राष्ट्रवादी सनातनी भारतीय हूँ।

⁣Rashtravaadi SanatanBharat में आपका स्वागत है !
#rudrastakam हम सनातनी ऋषियों की संतान है। नारायण के आत्मज ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र मरीचि हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप हुए जिन्होंने प्रजापति के १२ कन्याओं से विवाह कर अनेक तेजश्वी पुत्र उत्पन्न किए। उन १२ कन्याओं में मुख्य अदिति ने विवस्वान (सूर्य) को जन्म दिया। सूर्य के पुत्र मनु हुए जिनकी कन्या इला ने बुध से विवाह किया और पुरुरवा को जन्म दिया। बुध के पिता बृहस्पति हुए, जो अंगिरा के पुत्र हुए और अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र हुए। इस तरह से हम ययाति के पुत्र यदु (यदु वंश), पुरु (कुरुवश), तुवर्सु (यवन) , द्रुहु (भोजवंशी) , अणु (मलेच्छ) यही सारी मानवता के जनक हुए। सम्पूर्ण संसार सनातन से ही उत्पन्न हुआ है और मुझे गर्व है हम ऋषियों की संतान है। सनातन ही जगत का आधार है।
मेरे चैनल Rashtravaadi Sanatanbharat को subscribe, लाइक forward कीजिए । धन्यवाद ! मै राष्ट्रवादी सनातनी भारतीय हूँ।

⁣Rashtravaadi SanatanBharat में आपका स्वागत है !
#mahabharat #bhishmpitamah #Bhishmparva #worldmap #world
हम सनातनी ऋषियों की संतान है। नारायण के आत्मज ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र मरीचि हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप हुए जिन्होंने प्रजापति के १२ कन्याओं से विवाह कर अनेक तेजश्वी पुत्र उत्पन्न किए। उन १२ कन्याओं में मुख्य अदिति ने विवस्वान (सूर्य) को जन्म दिया। सूर्य के पुत्र मनु हुए जिनकी कन्या इला ने बुध से विवाह किया और पुरुरवा को जन्म दिया। बुध के पिता बृहस्पति हुए, जो अंगिरा के पुत्र हुए और अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र हुए। इस तरह से हम ययाति के पुत्र यदु (यदु वंश), पुरु (कुरुवश), तुवर्सु (यवन) , द्रुहु (भोजवंशी) , अणु (मलेच्छ) यही सारी मानवता के जनक हुए। सम्पूर्ण संसार सनातन से ही उत्पन्न हुआ है और मुझे गर्व है हम ऋषियों की संतान है। सनातन ही जगत का आधार है।
मेरे चैनल Rashtravaadi Sanatanbharat को subscribe, लाइक forward कीजिए । धन्यवाद ! मै राष्ट्रवादी सनातनी भारतीय हूँ।

⁣Rashtravaadi SanatanBharat में आपका स्वागत है !
@Ramabhajan
हम सनातनी ऋषियों की संतान है। नारायण के आत्मज ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र मरीचि हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप हुए जिन्होंने प्रजापति के १२ कन्याओं से विवाह कर अनेक तेजश्वी पुत्र उत्पन्न किए। उन १२ कन्याओं में मुख्य अदिति ने विवस्वान (सूर्य) को जन्म दिया। सूर्य के पुत्र मनु हुए जिनकी कन्या इला ने बुध से विवाह किया और पुरुरवा को जन्म दिया। बुध के पिता बृहस्पति हुए, जो अंगिरा के पुत्र हुए और अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र हुए। इस तरह से हम ययाति के पुत्र यदु (यदु वंश), पुरु (कुरुवश), तुवर्सु (यवन) , द्रुहु (भोजवंशी) , अणु (मलेच्छ) यही सारी मानवता के जनक हुए। सम्पूर्ण संसार सनातन से ही उत्पन्न हुआ है और मुझे गर्व है हम ऋषियों की संतान है। सनातन ही जगत का आधार है।
मेरे चैनल Rashtravaadi Sanatanbharat को subscribe, लाइक forward कीजिए । धन्यवाद ! मै राष्ट्रवादी सनातनी भारतीय हूँ।

⁣Jai Radha Giriwardhari | Krishna Bhajan | Sung by Chakrini Das
Rashtravaadi SanatanBharat में आपका स्वागत है !
#krishnabajan
हम सनातनी ऋषियों की संतान है। नारायण के आत्मज ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र मरीचि हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप हुए जिन्होंने प्रजापति के १२ कन्याओं से विवाह कर अनेक तेजश्वी पुत्र उत्पन्न किए। उन १२ कन्याओं में मुख्य अदिति ने विवस्वान (सूर्य) को जन्म दिया। सूर्य के पुत्र मनु हुए जिनकी कन्या इला ने बुध से विवाह किया और पुरुरवा को जन्म दिया। बुध के पिता बृहस्पति हुए, जो अंगिरा के पुत्र हुए और अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र हुए। इस तरह से हम ययाति के पुत्र यदु (यदु वंश), पुरु (कुरुवश), तुवर्सु (यवन) , द्रुहु (भोजवंशी) , अणु (मलेच्छ) यही सारी मानवता के जनक हुए। सम्पूर्ण संसार सनातन से ही उत्पन्न हुआ है और मुझे गर्व है हम ऋषियों की संतान है। सनातन ही जगत का आधार है।
मेरे चैनल Rashtravaadi Sanatanbharat को subscribe, लाइक forward कीजिए । धन्यवाद ! मै राष्ट्रवादी सनातनी भारतीय हूँ।

⁣Rashtravaadi SanatanBharat में आपका स्वागत है !
Hey Gopinath | Lord Krishna Bangali Version Bhajan | Sung by Chakrini Das
#krishnabhajan
हम सनातनी ऋषियों की संतान है। नारायण के आत्मज ब्रह्माजी के मानसिक पुत्र मरीचि हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप हुए जिन्होंने प्रजापति के १२ कन्याओं से विवाह कर अनेक तेजश्वी पुत्र उत्पन्न किए। उन १२ कन्याओं में मुख्य अदिति ने विवस्वान (सूर्य) को जन्म दिया। सूर्य के पुत्र मनु हुए जिनकी कन्या इला ने बुध से विवाह किया और पुरुरवा को जन्म दिया। बुध के पिता बृहस्पति हुए, जो अंगिरा के पुत्र हुए और अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र हुए। इस तरह से हम ययाति के पुत्र यदु (यदु वंश), पुरु (कुरुवश), तुवर्सु (यवन) , द्रुहु (भोजवंशी) , अणु (मलेच्छ) यही सारी मानवता के जनक हुए। सम्पूर्ण संसार सनातन से ही उत्पन्न हुआ है और मुझे गर्व है हम ऋषियों की संतान है। सनातन ही जगत का आधार है।
मेरे चैनल Rashtravaadi Sanatanbharat को subscribe, लाइक forward कीजिए । धन्यवाद ! मै राष्ट्रवादी सनातनी भारतीय हूँ।

Vis mere