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दुलाईवाली राजेंद्र बाला घोष dulaiwali Rajendra wala Ghosh #kahani #कहानी #Text #Book

2 ভিউ· 18/12/25
Deepakrajmanuj
Deepakrajmanuj
17 সাবস্ক্রাইবার
17
ভিতরে

राजेन्द्र बाला घोष हिंदी-नवजागरण की पहली छापामार लेखिका थीं। उन्होंने अपने आक्रामक लेखन द्वारा पुरुष-सत्तात्मक समाज की चूलें ढीली कर दीं। वे छद्माचार्यों द्वारा आरोपित चारित्रिक लांछनों से न टूटीं और न घबराईं बल्कि नये तेवर के साथ नारी-मुक्ति की लड़ाई जारी रखी। नतीजतन-स्त्री-स्वतंत्रता की बहाली के लिए उनका लेखकीय अभियान फेमिनिस्ट आन्दोलन का प्रथम अध्याय साबित हुआ। वे ' बंग महिला ' के छद्मनाम से लिखतीं थीं।

नारियों को रूढ़ तथा जड़ परम्पराओं के शिकंजे में कसने वाली शास्त्रीय व्यवस्थाओ को नकारती हुई बंग महिला ने स्त्री-शिक्षा का नया माहौल बनाया। उन्होंने नारियों के लिए स्वेच्छया पति का चुनाव करने, तलाक देने और यहाँ तक कि ‘पत्यन्तर’ करने के अधिकार की माँगें पुरजोर कीं। उनके लेखन में नया युग नई करवटें लेने लगा।

नि:सन्देह कहा जा सकता है कि बंग महिला के जीवन और कृतित्व में समकालीन नारी-लेखन के तमाम-तमाम मुद्दे अन्तर्भूत हैं।

बंग महिला हिंदी-कहानी लेखन की विचारधारा-सम्पन्न आदि महिला हैं। उन्हीं की बनाई जमीन पर प्रेमचन्द जैसे कहानीकार खड़े हुए। हिंदी कहानियों के लिए नया वस्तु-विधान करने, रचना-प्रक्रिया को अभिनव मोड़ देने और भाषा को समूची प्राण-सत्ता के सा‍थ संचलित करने में बंग महिला का कोई जोड़ नहीं।

बंग महिला हिंदी के पुरोधा समीक्षकों की लामबंदी का शिकार हो गई थीं। एक अदना, विधवा बंगाली स्त्री पुरुष-लेखकों का सरताज नहीं हो सकती थी। उन्हें आठ-नौ दशकों तक गुमनाम कर दिया गया।

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